Tuesday, 1 January 2013

हैवान और इंसान

 न तो मैं हैवान हूँ
और न ही मैं शैतान हूँ
बस मैं तो मामूली -सा एक इंसान हूँ
पूजा-पाठ में लिप्त होकर
अच्छे कर्म में करता हूँ
ईमानदारी की रोटी कमाकर
अपने परिवार का पेट मैं भरता हूँ
छल-कपट की दुनिया से दूर
अपना छोटा-सा इक संसार है
पर इस छोटे संसार से बाहर भी
जगमगाती दुनिया की बहार है
जहाँ सच्चे इन्सानों से अधिक
खून पीने वालों की भरमार है
हैवानों की इस दुनिया में
हैवानियत की होली खेली जाती है
परम्परा की आड़ में
सच्चे इन्सानों की दुनिया
सब कुछ झेले जाती है

डॉ.प्रीत अरोड़ा

1 comment:

  1. जीवन के मर्म वयक्त कराती सार्थक कबिता ........ www.sriramroy.blogspot.in

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