Thursday, 25 October 2012

खुशखबरी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

खुशखबरी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
आज खटीमा निवासी डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"जी ने मेरे चित्र पर यह बाल कविता लिखी है। उनकी अनुमति से इसे आप सब मित्रों के साथ शेयर कर रही हूँ।
"खेल-खेल में रेल चलायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
खेल-खेल
में रेल चलायें

(चित्र साभार-डॉ.प्रीत अरोरा)
आओँ बच्चों खेल सिखायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।।

इंजन राम बना है आगे,
उसके पीछे डिब्बे भागे,
दीदी हमको खेल खिलायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।।

साथ-साथ में हम गायेंगे,
सिगनल पर हम रुक जायेंगे,
अनुशासन का पाठ पढ़ायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।।

बड़े-बड़े हम काम करेंगे,
हम स्वदेश का नाम करेंगे,
पढ़-लिख कर ज्ञानी कहलायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।।

हम धरती माँ के सपूत हैं,
मानवता के अग्रदूत हैं,
विश्वगुरू फिर से बन जायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।।
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http://nicenice-nice.blogspot.in/2012/10/blog-post.html

5 comments:

  1. अरे वाह!
    मेरी रचना यहाँ भी है।
    अच्छा लगा देखकर!
    आभार!

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  2. बहुत सुन्दर चित्र कविता ...

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  3. सादर अभिवादन!
    --
    बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. बचपन की याद दिला कर ,भविष्य के लिये संदेश दे दिया ,
    सुन्दर !

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