समीरा पत्रिका जोकि हस्तनिर्मित (
ईकोफ्रेंडली ) कागज पर मुद्रित पत्रिका है .जो विशेष रूप से नारी – वर्ग के लिए
काम कर रही है .पत्रिका के फरवरी और मार्च अंक का अतिथि सम्पादन करने का सौभाग्य
मुझे प्राप्त हुआ है .मार्च का अंक वरिष्ठ लेखिका उर्मिला शिरीष जी पर केन्द्रित
करते हुए नारी जीवन से सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर आधारित होगा
.पत्रिका की सम्पादिका मीरा जी हैं . इसके लिए मीरा जी को बधाई और धन्यवाद
Thursday, 14 February 2013
Sunday, 13 January 2013
Friday, 4 January 2013
नैतिक मूल्यों का करें संरक्षण
आज कहने को तो हम आधुनिक हैं परन्तु दिखावट भरी जिन्दगी में हम अपने साँस्कृतिक मूल्यों को भूलते जा रहे हैं.सही अर्थों में किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके नैतिक गुणों जैसे-प्रेम,दया,सहानुभूति,ईमानदारी,सदभावना के आधार पर की जाती है.किन्तु आज हमारी सोच ,समाज,रहन-सहन,सँस्कृति यहाँ तक कि मूल्य भी बदल गए हैं.इसका कारण आधुनिक परिवेश,हमारी बदलती सोच,टूटते संयुक्त परिवार व सामाजिक वातावरण आदि हैं.चाहें हम आधुनिकता की चकाचौंध में अन्धाधुन्ध भागी जा रहे हैं.फिर भी हमें इन नैतिक मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए चूंकि मूल्यों को यदि बदलाव इसी तरह तेजी से होता चला गया तो आने वाले समय में क्या दशा होगी ?अतः आवश्यकता है पाश्चात्य सभ्यता के रंग में न रँगकर हम भारतीय सँस्कृति व सभ्यता और नैतिक मूल्य रूपी धरोहर को सँभालें ताकि एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना की जा सके .
डॉ.प्रीत अरोड़ा
डॉ.प्रीत अरोड़ा
Tuesday, 1 January 2013
हैवान और इंसान
न तो मैं हैवान हूँ
और न ही मैं शैतान हूँ
बस मैं तो मामूली -सा एक इंसान हूँ
पूजा-पाठ में लिप्त होकर
अच्छे कर्म में करता हूँ
ईमानदारी की रोटी कमाकर
अपने परिवार का पेट मैं भरता हूँ
छल-कपट की दुनिया से दूर
अपना छोटा-सा इक संसार है
पर इस छोटे संसार से बाहर भी
जगमगाती दुनिया की बहार है
जहाँ सच्चे इन्सानों से अधिक
खून पीने वालों की भरमार है
हैवानों की इस दुनिया में
हैवानियत की होली खेली जाती है
परम्परा की आड़ में
सच्चे इन्सानों की दुनिया
सब कुछ झेले जाती है
डॉ.प्रीत अरोड़ा
और न ही मैं शैतान हूँ
बस मैं तो मामूली -सा एक इंसान हूँ
पूजा-पाठ में लिप्त होकर
अच्छे कर्म में करता हूँ
ईमानदारी की रोटी कमाकर
अपने परिवार का पेट मैं भरता हूँ
छल-कपट की दुनिया से दूर
अपना छोटा-सा इक संसार है
पर इस छोटे संसार से बाहर भी
जगमगाती दुनिया की बहार है
जहाँ सच्चे इन्सानों से अधिक
खून पीने वालों की भरमार है
हैवानों की इस दुनिया में
हैवानियत की होली खेली जाती है
परम्परा की आड़ में
सच्चे इन्सानों की दुनिया
सब कुछ झेले जाती है
डॉ.प्रीत अरोड़ा
Saturday, 8 December 2012
खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी यह है वटवृक्ष पत्रिका के एक और एतिहासिक अंक का मुखपृष्ठ , यह अंक अभी प्रेस में है । नए साल में आप इसका दीदार कर पाएंगे । यह अंक हिन्दी समाज के 100 हस्ताक्षरों के साक्षात्कार पर केन्द्रित है । इस अंक का संयोजन संपादन करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है । पत्रिका के सम्पादक रविन्द्र प्रभात जी हैं.मुखपृष्ठ बनाया है अपराजिता कल्याणी ने
Sunday, 2 December 2012
बेटियाँ पराया धन
बेटिया तो होती ही हैं धन पराया
राजा हों या रंक कोई न इसे रख पाया
बेटी -बेटे मे ये भेदभाव क्यों होता है?
बेटा अंश बढाता है, बेटी को पराया कहा जाता है
जिसको वो जानती तक नहीं,
उसी के साथ नाता जोड़ दिया जाता है
लालन -पालन और एक -सी शिक्षा -दीक्षा
फिर बेटी को ही क्यों देनी पड़ती है अग्नि -परीक्षा
जो एक पल भी नहीं होती आँखों से दूर
अचानक वो चली जाती है होकर मजबूर
कितना कठिन होता है
यूँ जिगर के टुकड़े को अपने से दूर कर देना
लाड-प्यार से पाली अपनी लाडली को
परायों के सपुर्द कर देना
माँ-बाप, भाई-बहन का प्यार छोड़कर
नए रिश्ते जोड़ लेती है पुराने तोड़कर
आँखों में
नए सपने ले चली जाती है नया संसार बसाने
बचपन की यादे भुलाकर
ससुराल के रिश्ते निभाने
बस फिर उसका ससुराल अपना हो जाता है
और मायका पराया
पति-बच्चों मे रमकर भूल जाती है
वो अपना पराया
हाय ये कैसी रीत, कोई भी इसे न जाना
किस बेदर्द ने बनाया ये दस्तूर पुराना
डॉ.प्रीत अरोड़ा
राजा हों या रंक कोई न इसे रख पाया
बेटी -बेटे मे ये भेदभाव क्यों होता है?
बेटा अंश बढाता है, बेटी को पराया कहा जाता है
जिसको वो जानती तक नहीं,
उसी के साथ नाता जोड़ दिया जाता है
लालन -पालन और एक -सी शिक्षा -दीक्षा
फिर बेटी को ही क्यों देनी पड़ती है अग्नि -परीक्षा
जो एक पल भी नहीं होती आँखों से दूर
अचानक वो चली जाती है होकर मजबूर
कितना कठिन होता है
यूँ जिगर के टुकड़े को अपने से दूर कर देना
लाड-प्यार से पाली अपनी लाडली को
परायों के सपुर्द कर देना
माँ-बाप, भाई-बहन का प्यार छोड़कर
नए रिश्ते जोड़ लेती है पुराने तोड़कर
आँखों में
नए सपने ले चली जाती है नया संसार बसाने
बचपन की यादे भुलाकर
ससुराल के रिश्ते निभाने
बस फिर उसका ससुराल अपना हो जाता है
और मायका पराया
पति-बच्चों मे रमकर भूल जाती है
वो अपना पराया
हाय ये कैसी रीत, कोई भी इसे न जाना
किस बेदर्द ने बनाया ये दस्तूर पुराना
डॉ.प्रीत अरोड़ा
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